मरूस्थलीकरण प्रकोष्ठ

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परिचय

मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीसीडी) रियो सम्मेलनों में से एक है जो मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे (डीएलडीडी) पर केंद्रित है। युएनसीसीडी में ‘मरुस्थलीकरण’ के रूप में परिभाषित शुष्क भूमि क्षेत्रों (शुष्क, अर्ध शुष्क और शुष्क उप आर्द्र क्षेत्रों) के मरुस्थलीकरण के प्रसार या विस्तार के नहीं होने से संबं​धित नतीजों के विभिन्न तथ्यों को संदर्भित करता है।

कुल 194 पक्षों के साथ यूएनसीसीडी एक अद्वितीय साधन है, जो विश्व भर में सबसे कमजोर लोगों को दुष्प्रभावित करनेवाला महत्वपूर्ण कारक के रूप में क्षरण की पारिस्थितिकी प्रणालियों को पहचानता है। सम्मेलन का उद्देश्य सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों (एमडीजी) को अपनाना और कार्यान्वित करना है, जिससे  सतत विकास और भूमि क्षरण को रोक कर गरीबी को काम करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।

सम्मेलन वैश्विक चुनौतियों के समाधान के रूप में स्थायी भूमि प्रबंधन (एसएलएम) को बढ़ावा देता है।  भूमि क्षरण पारिस्थितिकी तंत्र  के कार्य और भूमि के ठीक से नहीं सुधरने की स्थिति में प्रभावित उत्पादकता के कारण पैदा हुआ एक लंबी अवधि का नुकसान है। जबकि स्थायी भूमि प्रबंधन परिस्थिति तंत्र के कार्यों और सेवाओं को बढ़ाने के क्रम में भूमि उपयोग भूमि क्षेत्र के इस्तेमाल पर केंद्रित है।

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यूएनसीसीडी रणनीति और चौथा राष्ट्रीय रिपोर्ट

जैसे ही सम्मलेन अपने दूसरे दशक में प्रवेश करेगा,पक्षों के द्वारा सर्वसम्मति से सितम्बर 2007 में  मैड्रिड में आयोजित सीओपी8  पर 2008—18 के लिए सम्मेलन (रणनीति) के कार्यान्वयन को बढ़ावा देने के लिए सर्वसम्मति से दस साल की रणनीति एवं ढांचे को अपनाया। रणनीति सम्मेलन की प्रमुख चुनौतियों में एक अनूठा अवसर प्रदान करती है, ताकि अपनी क्षमता का फायदा उठाने के लिए नई नीति और वित्तीय वातावरण के द्वारा उपलब्ध करवाए गए मौकों को अपनाने और एक नया माहौल बनाने तथा सभी यूएनसीसीडी के हितैषियों के लिए सामान्य जमीनी माहौल बनाना संभव हो पाए। इस रणनीति में दस वर्ष के ‘सामरिक उद्देश्य’ और लघु और मध्यम अवधि की कार्यवाही निर्देशित करने वाले ‘परिचालन का उद्देश्य’ प्राप्त करने की परिकल्पना की गयी है। रणनीति यहाँ से डाउनलोड की  जा सकता है।

भारत यूएनसीसीडी सचिवालय को हर चार साल में अपने दायित्वों के एक अभिन्न अंग के रूप में “राष्ट्रिय रिपोर्ट” प्रस्तुत करता है और हर दूसरे साल दलों के सम्मेलन (सीओपी) में भाग लेता  है। अभी तक उसकी 4 राष्ट्रिय रिपोर्ट प्रस्तुत की जा चुकी है। चौथी राष्ट्रीय रिपोर्ट में पिछले वर्षो की जगह एक संशोधित रिपोर्टिंग प्रारूप है।   नयी परिणामोन्मुख प्रबंधन संरचना को पोषित करने के लिए यूएनसीसीडी   ने दलों के सम्मेलन (सीओपी 9) के नौवें सत्र में एक नई उपलब्धि समीक्षा और कार्यान्वयन तंत्र का आकलन (पीआरएआईएस) करने का निर्णय लिया। यह सम्मेलन के लिए प्रभावी रणनीति के कार्यान्वन और कन्वेशन की समिति (सीआरआईसी) की रणनीति और सम्मेलन की नयी विधिवत तरीके से, जो उपलब्धि और प्रभावी संकेतकों की रिपोर्टिंग सर्वोत्तम प्रभावों और वित्तीय प्रवाहों पर आधारित है, समीक्षा करने की अनुमति देगा। रिपोर्टिंग खाका यहां उपलब्ध है—

चौथी रिपोर्टिंग और समीक्षा प्रक्रिया के माध्यम से सभी पक्ष  और अन्य रिपोर्टिंग संस्थाएं  निम्नलिखित के बारे में जानकारी प्रदान करेंगे:

  • रणनीति के पांच परिचालन उद्देश्यों के लिए निष्पादन के संकेतक;
  • वित्तीय प्रवाह (मानकीकृत वित्तीय ) एनैक्स और कार्यक्रम एवं परियोजना शीट (पी पी एस) के माध्यम से;
  • स्थायी भूमि प्रबंधन (एसएलएम) प्रौद्योगिकी पर सर्वोत्तम पद्दतिया, अनुकूलन  सहित ,
  • इस रिपोर्टिंग और समीक्षा प्रक्रिया में लागू हुए संकेतकों और प्रभावों का और साथ ही दूसरी प्रासंगिक जानकारी जो सीओपी को मुहैया करवाने की चाह रखने वाली रिपोर्टिंग की इकाइयां, का फीड
  • रिपोर्ट की तैयारी की प्रक्रिया में डेटा संग्रह और भारत के विभिन्न मंत्रालयों, अनुसंधान संस्थानों, संगठनों और नागरिक समाज के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का संश्लेषण शामिल होंगे। मसौदे के दस्तावेज को साझादारी के लिए सक्षम करने और अतिरिक्त जानकारी को शामिल कर  एक राष्ट्रीय परामर्श बनाने की परीयोजना है।

भारत का दायित्व अतिरिक्त देश में सम्मेलन के कार्यान्वयन को सुधारने के लिए पीआरएआईएस के तहत रिपोर्टिंग की जरूरतों को पूरा करना एवं मरुस्थलीकरण के विरुद्ध मुकाबले में राष्ट्रीय प्रगति का आकलन करना है। यह प्रक्रिया मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने में आम लक्ष्य से जुडी विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी एजंसियों के कार्यक्रमों, परियोजनाओं एवं वित्तीय प्रवाह को व्यवस्थित करने में सहायक होंगी।

भारत में यूएनसीसीडी

भारत 14 अक्टूबर 1994 को यूएनसीसीडी का एक हस्ताक्षरकर्ता बन गया है, और इसकी 17 दिसंबर 1996 को पुष्टि की गई। भारत की 32 प्रतिशत भूमि भूमिक्षरण से प्रभावित है भारत यूएनसीसीडी को दृढ़ता से लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। पर्यावरण और वन मंत्रालय यूएनसीसीडी के लिए भारत सरकार का नोडल मंत्रालय है और सम्मेलन से संबंधित सभी मुद्दों पर मंत्रालय के तहत समन्वय के लिए मरुस्थलीकरण सेल एक नोडल प्वाइंट है। भारत मरुस्थलीकरण पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय घटनाओं में सक्रिय रूप से भाग लेता है और वर्तमान में एशिया और प्रशांत क्षेत्र के लिए क्षेत्रीय कार्यान्वयन एनेक्सी का अध्यक्ष है ।

हालांकि भारत के पास मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए एक विशिष्ट नीति या विधायी ढांचा नहीं है, भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण को रोकने और उसे पलटने से संबंधित ​चिंता हमारी कई राष्ट्रिय नीतिओ में परिलक्षित है, इन नीतियों मे इस प्रकार भी समस्याओं के समाधान के लिए प्रावधान है। ( उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय जल नीति 1987, राष्ट्रीय वन नीति 1988, राष्ट्रीय कृषि नीति 2000, वन (संरक्षण) अधिनियम 1980, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986, राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006, किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति 2007, राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) – 2007)यह स्थायी वन प्रबंधन(एसएफएम),स्थायी कृषि,स्थायी भूमि प्रबंधन (एसएलएम) और देश द्वारा जारी सतत विकास के व्यापक लक्ष्यों में भी अंतर्निहित है। वास्तव में हमारे योजनाकारों और नीति निर्माताओं का ध्यान नियोजन की स्थापना के समय से ही यह विषय आकर्षित करता रहा है । पहली पंचवर्षीय योजना 1951-1956 ‘भूमि पुनर्वास’ के प्रबल क्षेत्रों में से एक थी। बाद की योजनाओं में भी शुष्क भूमि के लगातार विकास की उच्च प्राथमिकता जुड़ी रही है।

डीएलडीडी और आजीविका सुरक्षा के मुद्दों का समाधान भारत सरकार की एजेंसियों के विभिन्न परियोजनाओं और कार्यक्रमों के तहत किये जाते हैं, जैसे कृषि मंत्रालय (कृषि एवं सहकारिता का विभाग , राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण विभाग, आदि), ग्रामीण विकास मंत्रालय (भूमि संसाधन विभाग,एमएनआरईजीए), जल संसाधन मंत्रालय, पंचायती राज मंत्रालय, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और योजना आयोग।

कार्यक्रम और पहल को पिछले 40 वर्षों से वर्ष 1973-74 के संभावित सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (डीपीएपी) के साथ चलाया जा रहा है और तत्पश्चात ये कार्यक्रम चलाए गए , झूम कृषि क्षेत्रो में वाटर शेड विकास परियोजना (डब्लूडीपिएससीए)—1974—75, मरूभूमि विकास कार्यक्रम (डीडीपी)1977—78, क्षारीय मिट्टी सुधार और विकास (आरएएस) 1985-86,समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम (आईडब्ल्यूडीपी) 1989, वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए समेकित वनरोपण और पारिस्थितिकी विकास परियोजनाएं (आईएईपीएस)योजना1989-90,वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय वाटरशेड विकास परियोजना(एनडब्ल्यूपीआरए)-1990-91, नदी घाटी परियोजनाओं के जलग्रहण में मृदा संरक्षण(आरवीपी)1992, अवक्रमित वनों के उत्थान में अनुसूचित जातियों और ग्रामीण निर्धन परिसंघ (एएसटीआरपी), 1992—93 में प्रारंभ किये गए और बाद में राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम में विलय कर दिये गए राष्ट्रीय वनीकरण (एनएपी) 2002—03 तथा एकीकृत जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम (आईडब्लूएमपी)2008।

भारत द्वारा तैयार और वर्ष 2001 में प्रस्तुत की गई मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनएपी), ​जो सम्मेलन(यूएनसीसीडी) के पक्षकारों दायित्वों को पूरा करना अपेषित है। मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए एक व्यापक खाका, राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम के तहत बहुक्षेत्रीय प्रकृति को पहचानना है। इस दृष्टिकोण से मरुस्थलीकरण के संचालकों को आपसी विस्तार देना है। उदाहरण के लिए, आम नागरिकों की गरीबी मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण के लिए प्रमुख कारक के रूप में जाना जाता है, जिसे हल करने की आवश्यकता है।

डीएलडीडी के मुद्दों को हल करने और रियो सम्मेलनों (यूएनएफसीसीसी और सीबीडी) के अनुरूप , सतत भूमि एवं पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन के लिए देशों की भागीदारी कार्यक्रम (एसएलईएम सीपीपी)को विकसित किया गया। एसएलइएम कार्यक्रम भारत सरकार और वैश्विक पर्यावरण सुविधा (जीईएफ)के दरम्यान देशों की भागीदारी कार्यक्रम (सीपीपी) के तहत एक संयुक्त पहल है। एसएलइएम कार्यक्रम संबंधी दृष्टिकोण का उद्देश्य ”स्थायी भूमि और जैव विविधता के प्रबंधन के उपयोग को बढ़ावा देने के साथ बेहतर पारिस्थितिकी प्रणालियों सेवाओं को प्रदान करने की क्षमता को बनाए रखने” का है। इस एसएलइएम ​कार्यक्रम संबंधी दृष्टिकोण के अंतर्गत सात परियोजनाओं को तैयार किया गया है, जिसमें से छह का कार्यान्वयन विभिन्न चरणों के हैं।