परिचय

वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, 25 अक्टूबर 1980 से अस्तित्व में आया । इस अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत, वन भूमि का गैर-वानिकी प्रयोजनों के लिए परिवर्तन करने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है। इसलिए राष्ट्र हित और भविष्य की पीढ़ियों के हित में यह अधिनियम वन भूमि के गैर-वानिकी प्रयोजनों के लिए परिवर्तन को विनियमित करता है । इस अधिनियम का मूल उद्देश्य, वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग के लिए होने वाले अंधाधुंध परिवर्तनों को विनियमित करना तथा देश की विकासात्मक आवश्यकताओं एवं प्राकृतिक विरासत के संरक्षण के बीच तालमेल बनाए रखना है । इस अधिनियम के अंतर्गत प्रक्रियाओं को सरल बनाने, विलंब में कमी लाने और अधिनियम को अधिक उपयोगकर्ता अनुकूल बनाने के लिए समय-समय पर दिशानिर्देश जारी किए गए हैं । इसे सुनिश्चित करने के लिए हाल ही में इस अधिनियम के अंतर्गत नए नियम बनाए गए हैं और 10 जनवरी, 2003 को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किए गए हैं ।

अधिनियम ने वन भूमि के गैर वानिकी प्रयोजनों के लिए अंधाधुंध गति से दिए जाने पर नियंत्रण करने में सफलता प्राप्त की है। वर्ष 1980 से पहले वन भूमि की गैर वानिकी प्रयोजनों के लिए परिवर्तन किए जाने की दर लगभग 1.43 लाख हैक्टेयर प्रति वर्ष थी, लेकिन वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के आगमन के साथ ही वन भूमि परिवर्तन की दर लगभग 15,000 हैक्टेयर प्रति वर्ष पर आ गई और अधिकांश वन भूमि परिवर्तन की अनुमति पेयजल परियोजनाओं, सिंचाई परियोजनाओं, संचारण लाइनों, रेलवे लाइनों, सड़कों, ऊर्जा परियोजनाओं, सुरक्षा संबंधी परियोजनाओं, खनन इत्यादि की विकासात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दी जाती है । वन भूमि की गैर वानिकी प्रयोजनों के ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रतिपूरक वनीकरण निर्धारित किया गया है और जलग्रहण क्षेत्र उपचार योजना, वन्यजीवन आवास सुधार योजना, पुनर्वास योजना इत्यादि क्रियान्वित किए जा रहे हैं, ताकि हरे-भरे वनों के ऐसे व्यापक क्षेत्र के परिवर्तन से होने वाले दुष्प्रभावों को कम किया जा सके ।  देश में प्रतिपूरक वनीकरण के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए, “प्रतिपूरक वनीकरण प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (सीएएमपीए)” नामक प्राधिकरण का राष्ट्रीय स्तर पर गठन किया जा रहा है । विभिन्न चरणों पर प्रस्तावों के आवागमन तथा उपयोगकर्ता एजेंसियों द्वारा वानिकी स्वीकृतियों के लिए निर्धारित शर्तों के अनुपालन की निगरानी करने के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में एक निगरानी प्रकोष्ठ भी स्थापित किया जा रहा है।