हाथी ( एलिफास मैक्सिमस ) भारत का सबसे बड़ा स्थलीय स्तनपायी है. व्यापक सीमा में पाए जाने के कारण हाथी को बडे़ क्षेत्रों की आवश्यकता होती है. हमारे पुराणों के अनुसार, हाथी का जन्म आकाशीय जल से हुआ था और इसलिए इस मान्यता के कारण वह वर्षा / जल के साथ निकट रूप से संबद्ध है. हाथी के लिए भोजन और पानी की आवश्यकता अत्यधिक होती है और इसीलिए उनकी संख्या का समर्थन केवल इष्टतम परिस्थितियों वाले वनों द्वारा ही किया जा सकता है. हाथियों की स्थिति वनों की स्थिति का सबसे अच्छा संकेत हो सकती है. एशियाई हाथी को व्यापक रूप से वितरित माना जाता रहा है – पश्चिम एशिया में टिगरिस – महानद से लेकर पूर्व की ओर भारतीय उप-महाद्वीप में पर्शिया तक, श्रीलंका, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो सहित दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया और उत्तरी चीन तक. हालांकि वर्तमान में वे भारतीय उप-महाद्वीप, दक्षिण पूर्व एशिया तथा कुछ एशियाई द्वीपसमूहों – श्रीलंका, इंडोनेशिया और मलेशिया तक ही सामित रह गए हैं. एशियाई हाथियों की लगभग आधी संख्या भारत में है.

पुराने साहित्य यह संकेत देते हैं कि मुगलकाल में भी, मध्य भारत के कई भागों जैसे मेवाड़, चंदेरी, सतवास, बीजागढ़ और पन्ना सहित संपूर्ण भारतवर्ष में हाथी पाए जाते थे. हालांकि वर्तमान में भारत में जंगली हाथियों का वितरण दक्षित भारत; उत्तर पश्चिमी बंगाल सहित उत्तर पूर्व; उड़ीसा के मध्य भारतीय राज्य, दक्षिण पश्चिम बंगाल एवं झारखंड; तथा उत्तराखंड और उत्तरप्रदेश में उत्तर पश्यिम तक सीमित रह गए हैं.

भारत सरकार द्वारा हाथी परियोजना (पीई) का शुभारंभ 1992 में एक केंद्रीय प्रायोजित स्कीम के रूप में निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ किया गया था:

  • हाथियों, उनके आवास और गलियारों की रक्षा करना
  • मानव-पशु विरोध की समस्याओं को हल करना
  • पालतू हाथियों का कल्याण करना

देश में हाथियों की अधिकांश संख्या रखने वाले राज्यों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है. परियोजना मुख्य रूप से 13 राज्यों / केंद्रशासित प्रदेशों, अर्थात्, आंध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, असम, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मेघालय, नागालैंड, उड़ीसा, तमिलनाडु, उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में क्रियान्वित की जा रही है. महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ को भी लघु सहायता दी जा रही है. परियोजना के अंतर्गत मुख्य गतिविधियां इस प्रकार हैं:

  • हाथियों के मौजूदा प्राकृतिक आवास और प्रवासी मार्गों का पारिस्थितिक पुनर्वास;
  • हाथियों के आवास और भारत में जंगली एशियाई हाथियों की व्यवहार्य जनसंख्या के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक एवं योजनाबद्ध प्रबंधन का विकास;
  • जटिल आवासों में मानव-हाथी विरोध के शमन हेतु उपायों का प्रचार-प्रसार और हाथियों के जटिल आवासों में मनुष्यों और पालतू पशुओं के दबाव को मध्यम करना;
  • शिकारियों और मृत्यु के अप्राकृतिक कारणों से जंगली हाथियों की सुरक्षा के उपायों को सुदृढ़ करना;
  • हाथी प्रबंधन संबंधी समस्याओं पर अनुसंधान;
  • जन शिक्षा एवं जागरूकता कार्यक्रम;
  • पारिस्थितिक-विकास
  • पशु-चिकित्सा संबंधी देखभाल

पंचवर्षीय योजनाओं में परिव्यय /व्यय ( करोड रूपए में )

वर्ष 2007-08 में जंगली हाथियों की जनसंख्या का अनुमान

देश में हर पांच वर्ष के अंतराल पर जंगली हाथियों की अखिल भारतीय गणना की जाती है. नीचे दिखाए गए राज्यों के तुलनात्मक आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में जंगली हाथियों की अनुमानित जनसंख्या २००२ की तुलना में एक हज़ार से भी अधिक की वृद्धि हुई है

जंगली हाथियों की अनुमानित संख्या  – 2007-08

हाथी रिजर्व:

विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अभी तक 26 हाथी रिजर्व (ईआर), 60,000 किमी से भी अधिक क्षेत्र तक विस्तारित करके आरंभिक रूप से अधिसूचित किए जा चुके हैं. पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा 6 और हाथी रिजर्व के लिए सहमित दी जा चुकी है, ये हैं – उड़ीसा में बैतरिणी हाथी रिजर्व तथा दक्षिण उड़ीसा ईआर, छत्तीसगढ़ में लेमडू तथा बादलखोड़ और उत्तर प्रदेश में गंगा-यमुना (शिवालिक) हाथी रिजर्व, मेघालय में खासी ईआर. संबंधित राज्य सरकारों द्वारा अभी इन हाथी रिजर्व  को अधिसूचित किया जाना है.

2005 की गणना के अनुसार हाथी रिजर्व की क्षेत्र और संख्या-वार सूची इस प्रकार है. वर्ष 2005 में पहली बार ईआर में गणना की गई थी. हाथी रिजर्व में अगली गणना 2010 में की जाएगी.

भारत में अनुमानित संख्या के साथ हाथी रिजर्व

हाथी परियोजना के अंतर्गत वर्ष 2002-03 से 2008-09 तक राज्य-वार जारी किया गया धन

हाथी परियोजना के अंतर्गत जारी की गई अनुग्रह राशि

हाथियों की अवैध हत्या की निगरानी ( माइक ) कार्यक्रम

सीआईटीईएस के सीओपी संकल्प द्वारा आदेशित, माइक कार्यक्रम को २००३ में दक्षिण एशिया में निम्नलिखित प्रयोजन से प्रारंभ किया गया –
हाथियों की सीमा वाले राज्यों को उचित प्रबंधन एवं प्रवर्तन निर्णय लेने के लिए आवश्यक जानकारी प्रदान करना, और हाथियों की सीमा वाले राज्यों में उनके हाथियों की जनसंख्या के दीर्घकालीन प्रबंधन हेतु संस्थागत क्षमता का निर्माण करना
माइक के मुख्य उद्देश्य हैं :

  • हाथियों के अवैध शिकार के स्तरों और रूझानों का मापन करना;
  • इन रूझानों में समय के साथ होने वाले परिवर्तनों का पता लगाना; और
  • ऐसे परिवर्तनों का कारण बनने वाले या उनसे संबद्ध तथ्यों का पता लगाना, और विशिष्ट रूप से यह आंकलन करने का प्रयास करना कि निरीक्षित रूझान किस

हद तक सीआईटीईएस के पक्षकारों के सम्मेलन द्वारा लिए गए निर्णयों का परिणाम हैं

कार्यक्रम के अंतर्गत सभी राज्यों से मासिक आधार पर निर्दिष्ट माइक पैट्रोल फ़ॉर्म में डेटा एकत्रित किया जा रहा है और उसे दक्षिण एशिया कार्यक्रम के दिल्ली स्थित उप क्षेत्रीय सहायता कार्यालय में जमा किया जा रहा है, जो कार्यक्रम के क्रियान्वयन में मंत्रालय की सहायता कर रहे हैं.

भारत में माइक के स्थान

1. चिरांग रिपु ( असम )
2. ढांग पत्की ( असम )
3. पूर्वी दुआर ( पश्चिम बंगाल )
4. देओमाली ( अरूणाचल प्रदेश )
5. गारो हिल्स ( मेघालय )
6. मयूरभंज ( उड़ीसा )
7. मैसूर ( कर्नाटक )
8. निलगिरी ( तमिलनाडु )
9. शिवालिक ( उत्तराखंड )
10. वायनाड ( केरल )