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    Dr Shankar Lal Shastri
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Subject:-

SAVE NATURE SAVE LIFE PRAKRITI BACHAYEN JIVAN BACHAYEN

Story:-

प्रकृति बचाएं जीवन बचाएं
मेरा बचपन प्रकृति मां की शरण में गुजरा। जब मैं छोटी कक्षा में पढ़ता था तब मेरे घर से तकरीबन 6 किलोमीटर दूर एक गांव में पढ़ने जाया करता था । तब आवागमन के साधन न थे ।जब आठवीं कक्षा का मैं छात्र था तभी    पिताश्री का  असामयिक निधन हो गया था ।उसके बाद सिर के ऊपर आसमान और नीचे धरती मां मेरे जीवन की रक्षिका  थ बचपन में विद्यालय से लौटते हुए जब नए जोहड़ पर ठहरते और बाल संग खेलते - कूदते गोधूलि वेला में गाये जंगल में चरकर आती और गांव के ग्वाल बाल डांसरिए  और    खडूले लाते  और हमें थोड़ा-थोड़ा कर सबको देते थे ।जोहड़ में पानी पीकर गाये घर  जाती   उनके पैरों से उड़ती धूल से हमने गोधूलि का महत्व समझा।   जोहड़ के बरगद बाबा की छांव के नीचे बैठकर कुदरत के खूबसूरत दृश्यों को देखते  हुए जब आज भी मैं मेरे गांव जाता हूं तो मुझे  बाल्यकाल में प्रकृति मां के करीब रहने के वे  दिन याद आते हैं।
  मैंने गांव के बरगद बाबा को देखा तो  मुझे वह आज भी वैसे ही खड़ा दिखाई   दिया किंतु वह उदास  था जिसे न  जाने हमारे कितने पूर्वजों ने देखा था। क्योंकि आज इंसान ने कुदरत से दूरी बना ली।
 पुराणों में तो एक वृक्ष को 10 पुत्रों के बराबर माना गया है। परिवार के लोग धोखा दे सकते हैं किंतु घर के बाहर लगा वृक्ष सदैव हमारा हित करता है। सुबह-सुबह आज भी प्रतिदिन गौमाताए घर आती हैं । मैं अपलक दृष्टि से उन्हें निहारता हूं।
 गाय की आंखों में देखने से अवसाद का खात्मा होता है, ऐसा मैंने पढ़ा था गौमाताओं  और उनकी  बछियाओ का नाम तो मेरे दोनों बच्चों   सौम्य (चिराग )और प्रियांशु ने सोनू मोनू ही रख दिया है ।
मैं आज भी ज्यादातर पदयात्रा ही करता हूं। मेरे घर में आज भी कोई डीजल पेट्रोल का वाहन देखने को नहीं मिलेगा। बस 2 साइकिलें जरूर मिलेंगी जो पर्यावरण संरक्षण में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। कई शोधों ने साबित कर दिया है कि हम कुदरत के जितना करीब रहेंगे उतने ही हम खुश रहेंगे । कुदरत के करीब रहने के कारण ही मैं पर्यावरण से जुड़े कई शोध लेख लिख पाया और कई कहानियां व गीत रचनाएं भी  रच पाया ।
राजस्थान पत्रिका में कोरोना काल में पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी कई छोटी-छोटी प्रेरणास्पद कहानियां लिखीं तो वहीं दूसरी और कई गीत रचनाएं भी । आज भी जहां मुझे ऊंचे ऊंचे-ऊंचे पहाड़ ,घने वृक्षों की  छटाएं देखने को मिलती हैं ।बस मन करता है जीवन वहीं बसाया जाए ।
  स्वप्नवासवदत्ता नाटक में आश्रम की छटा में जो वर्णन किया है वह पर्यावरण संरक्षण का ही तो संदेश देता है वहीं कालिदास की शकुंतला तो स्वयं एक  प्रकृति कन्या ही है जो स्वयं जल न पीकर वृक्षों को सींचती है। वेदों में सर्वत्र पर्यावरण संरक्षण की महनीया  ऋचा एं रची  हैं जो हमारे  ऋषियों के कंठ से ही गूंजी हैं ।
अथर्ववेद में 63 मंत्रों का एक पृथ्वी सूक्त है जिसे हम धरती मां की रक्षा का कवच कह सकते हैं।  बस आवश्यकता है उसे आत्मसात करने की।
 मुझे खुशी है कि मैं पर्यावरण -संरक्षण के लिए अपनी आहुति देकर देश के कुछ काम आ सकूं और प्रकृति से जुड़ी मेरी लघु कथाएं हमारे छात्र समाज और युवा वर्ग को लाभान्वित कर पाएं।
 वेदों में रचा हमारा शांति पाठ तो प्रकृति का  ही शाश्वत संदेश  देता है ।
डॉ शंकर लाल शास्त्री
शाहपुरा ,जयपुर राजस्थान

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